
क्या भारत का न्यायिक तंत्र पुरुषों की पीड़ा को सुनने में असफल हो रहा है?
बेंगलुरु के इंजीनियर Atul Subhash अतुल सुभाष की आत्महत्या ने न केवल व्यक्तिगत दर्द को उजागर किया, बल्कि हमारे सिस्टम की गंभीर खामियों पर भी सवाल खड़े किए हैं। 24 पन्नों का सुसाइड नोट और 80 मिनट का वीडियो यह चीख-चीख कर कहता है कि कैसे दो साल में उन्हें 120 बार अदालत के चक्कर काटने पड़े और उन पर तीन करोड़ रुपये का दबाव बनाया गया।
अतुल की अंतिम इच्छाओं ने हमें झकझोर कर रख दिया—
1. उनकी पत्नी और उसके परिवार को उनके शव के करीब भी न आने देने का आदेश।
2. दोषियों को सजा न मिलने तक उनकी अस्थियां न विसर्जित करने की मांग।
3. बेटे की कस्टडी माता-पिता को देने की अपील।
“अगर अदालत सबूतों के बाद भी दोषियों को बरी कर देती है, तो मेरी अस्थियां कोर्ट के बाहर गटर में बहा दी जाएं।” – अतुल का यह वाक्य न्याय प्रणाली के प्रति उनकी हताशा का प्रतीक है।
क्या पुरुषों के लिए कोई “आयोग” है?
अतुल के संघर्ष की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब महिलाओं के लिए कई कानून और आयोग हैं, तो पुरुषों के अधिकारों की सुनवाई कौन करेगा? क्यों नहीं पुरुषों के लिए भी एक आयोग स्थापित किया गया है, जो ऐसे मामलों को गंभीरता से ले?
“क्यों नहीं होती पुरुषों के दर्द की सुनवाई? अतुल सुभाष की आत्महत्या और न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल”

अतुल सुभाष: एक आत्महत्या या न्याय के लिए हताश आखिरी कदम?
अतुल सुभाष की आत्महत्या ने हमें एक कठोर और कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया है – क्या पुरुषों के दर्द और मानसिक उत्पीड़न को हमारे समाज में कभी गंभीरता से लिया जाता है? 24 पन्नों का उनका सुसाइड नोट और आत्महत्या से पहले का वीडियो, जिसमें उन्होंने अपनी परेशानियों और उत्पीड़न का जिक्र किया, यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या न्याय व्यवस्था सचमुच सभी की सुनती है, या केवल कुछ चुनिंदा आवाजों को ही जगह मिलती है?
“120 तारीखें, 3 करोड़ की डिमांड और अनगिनत पीड़ाएँ”
अतुल का जीवन दो साल तक कोर्ट कचहरी और परिवार के दबावों के बीच उलझा रहा। 120 तारीखों और 3 करोड़ की डिमांड ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। उनके आत्महत्या के पीछे की कहानी केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक ऐसा संकट है जिसे हमारी न्याय प्रणाली को गंभीरता से देखना चाहिए। क्या एक व्यक्ति को न्याय की इतनी लंबी और निराशाजनक यात्रा पर भेजना सही है?
“मर्दों की पीड़ा क्यों अनदेखी रहती है?”
अतुल ने अपने सुसाइड नोट में खुलासा किया कि कैसे उसकी पत्नी और उसके परिवार ने उसे लगातार प्रताड़ित किया। क्या यह सिर्फ एक घटना है, या समाज के भीतर छिपे हुए पुरुषों के दर्द की गहरी अनकही कहानी का हिस्सा है? क्या पुरुषों के अधिकारों और उनके मानसिक स्वास्थ्य को उस स्तर पर स्वीकार किया जा रहा है, जैसा कि महिलाओं के मामलों में होता है?
“न्याय व्यवस्था में समानता की कमी: क्या पुरुषों के अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है?”
अतुल ने अपनी मौत से पहले यह कड़ा बयान दिया कि अगर न्याय नहीं मिला, तो उसकी अस्थियाँ भी न्यायालय के बाहर बहा दी जाएं। क्या यह बयान सिर्फ अतुल का व्यक्तिगत दुख था, या यह उस अन्याय और असमानता का प्रतीक है, जिससे हजारों पुरुषों को प्रतिदिन जूझना पड़ता है? हमारी न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और समानता पर गंभीर सवाल उठता है।

“किसे दोष दें? क्या न्याय प्रणाली और समाज दोषी नहीं हैं?”
अतुल के परिवार ने यह स्पष्ट किया कि उन्हें यह सब छुपाने का दबाव था क्योंकि उन्हें डर था कि उनकी गरिमा पर आंच आएगी। क्या हमारे समाज में पुरुषों के दर्द को इतना नजरअंदाज किया जाता है कि उन्हें अपनी तकलीफों को छुपाना पड़ता है? क्या हम एक ऐसी व्यवस्था में जी रहे हैं, जहाँ केवल कुछ ही आवाज़ों को महत्व दिया जाता है?
“यह केवल अतुल की कहानी नहीं, यह लाखों अनकही आवाज़ों की गवाही है”
अतुल की आत्महत्या हमें यह समझने का एक मौका देती है कि पुरुषों के अधिकार और उनकी पीड़ा पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। जब तक समाज और न्याय व्यवस्था दोनों पुरुषों के दर्द और उत्पीड़न को समझने और स्वीकारने में सक्षम नहीं होंगे, तब तक इस तरह की घटनाएँ निरंतर होती रहेंगी।
“क्या न्याय व्यवस्था सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित है?”
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी न्याय प्रणाली सचमुच निष्पक्ष है, या यह सिर्फ कुछ विशेष वर्ग और लिंग के लिए बनाई गई है? क्या ये एक सोया हुआ सिस्टम है।अतुल सुभाष के केस ने एक गंभीर सवाल उठाया है: क्या हम एक समान न्याय व्यवस्था में विश्वास कर सकते हैं, या यह केवल एक धोखा है?
हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे गंभीरता से लें और इस दिशा में ठोस कदम उठाएं।